बेटियों की दशा : गाँव की जुबानी
हम सभी को पता है की हमारे देश को आजाद हुए कईओं वर्ष हो गए हैं.
हमारे देश को अंग्रेजो की बेड़ियों से मुक्ति मिले काफी समय हो गया है पर गौर करने की बात ये है की हमारे देश की बेटियां कब आजाद होंगी हमारे ऑर्थोडोक्सी सोच के बेड़ियों से.. आखिर कब उन्हें मुक्ति मिलेगी |
इससे पहले की मेरी बातों को पढ़ के आपके अंदर मेरा विरोध करने की आवृत्ति आये अपने सब्दों को स्पस्टता के साथ आपके समक्ष रखने जा रही हु |
आज हमारे देश में बेटियों को बेटो की बराबरी का दर्जा देने का मुहीम जोरो सोरो से है पर क्या किसी ने गौर किया है की इस बराबरी की सिमा कहाँ तक है...?????????
नहीं न कोई ताजुब की बात नहीं है , क्युकी हमारे देश में तो हर रोज नयी मुहिम चलायी जाती हैं हजारो लोग इसका हिस्सा भी बनते हैं पर कोई नहीं देखने आता है की अंत में ये मुहीम अपने लक्ष्य तक पहुंच भी पाती हैं या नहीं ये बात मैंने अपने पहले प्रकाशन में स्पस्ट कहा है |
हमारे गाँव में बेटियों को बहुत से अधिकार मिलते हैं जिनका आईना मैं आपके सामने आज लाऊंगी : बी ए पास होने का अधिकार , अपनी बात न रखने का अधिकार , अपने बचपन को रसोई व चूल्हे में झोक देने का अधिकार , अपने सपनो को शादी के बेड़ियों में बाँध देने का अधिकार , हर रोज अपने ईमान को चोटिल देख कर भी चुप रहने का अधिकार , हिंसा सहने और अपने समक्ष हिंसा देख के ना बोलने का अधिकार और सबसे आखिरी और सबसे बड़ी बात अपने मानव अधिकारों के जानकारी से वंचित रहने का अधिकार जो इन सभी अधिकारों का जन्म दाता है |
आखिर कबतक हमारे गाँव की बेटियों को इन अधिकार रूपी बोझों का भार उठाना पड़ेगा समय आ गया है इन सभी अधिकारों से ऊपर उठने का , जरुरत है अब तो एक ऐसे मुहीम की जो उनको उनके अधिकारों से वंचित होने के कारणों को जड़ से मिटा दे |
हमारी सबसे बड़ी नाकामयाबी १०० प्रतिशत का परिणाम सोच लेना है बिना अपना १०० प्रतिशत दिए किसी महान व्यक्ति ने कहा है की अगर हम अपना १०० प्रतिशत देते हैं तो कोई ऐसी ताकत नहीं है जो हमारा १०० प्रतिशत छीन ले |
अर्थात सिर्फ मुहीम चलने से बेटियां बेटों के बराबर नहीं होंगी हमे उसकी शुरुआत बेटियों को बेटो के बराबर न होने के कारणों को मिटाने की मुहीम से करनी होगी जो सिर्फ चले नहीं बल्कि अपने अपेक्षित परिणाम तक पहुंचे |
अगर हमे बेटियों के दशा को गाँव में वास्तव में बेहतर करनी है तो हमे शिक्षा के क्षेत्र में इतना उज्जवल बनना होगा की सिर्फ गाँव की बेटियां ही नहीं बल्कि पूरा समाज उनके अधिकारों और क्षमताओं के विषय में जागरूक हो |
गाँव की आवाज में अब बारी है बेटियों के उन बुलंद आवाजों के शोर के गूजने की जो उन्हें उनकी दायित्व से परिचिति कराएं और उन्हें भी देश के विकाश में अपनी पूरी भागीदारी देने का अवसर प्रदान करे जिसके लिए अब आपका इस प्रकासन को सिर्फ पढ़ना अवस्यज नहीं बल्कि इस्पे चिंतन करके इस मुद्दे को दूसरों तक भी पोाहचना अति अवस्यकी है क्योंकि अब गाँव को हाथो हाथ लेने की जगह उसके विकाश क लिए हाथ पकड़ के चलने का वक्त अब आ गया है
रिपोर्ट - कुमुद सिंह , बलिया

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