दहेज़ का दुश्मन एक अनोखा गाँव
दहेज़ एक ऐसी कुरीति है जिसके चलते देश में हर साल हजारो लडकियों को अपनी
जान तक गवानी पड़ती है लेकिन यूपी का एक गाँव ऐसा भी है जहां दहेज़ लेने और
देने वालो के लिए यहाँ कोई जगह नहीं है | यहाँ आज तक किसी घर में कभी न तो
दहेज़ लिया गया है और न दिया गया है | सबसे हैरत में डालने वाली बात इसकी
वजह कोई कानूनी भय या शिक्षा का उच्च स्तर नहीं बल्कि इस गाँव की एक ऐसी
सदियों पुरानी परम्परा है जिसने दहेज़ नाम की सामाजिक बुराई को आज तक
इसगाँव में पनपने नहीं दिया | यह गाँव है इलाहाबाद जिले का कपारी गाँव |
यूपी
और एम् पी की सीमा में स्थित इलाहबाद इस गाँव एक ऐसी खासियत है जिसे आप
देश के किसी दुसरे गाँव में शायद ही खोज पायें | यह एक ऐसा गाँव है जहा
शादी में दहेज़ लेने और देने दोनों पर पाबंदी है | गाँव के बुजुर्ग जवागाल
नाथ बताते है की इस गाँव के इतिहास में आज तक किसी घर में दहेज़ लेकर या
देकर कोई शादी नहीं हुई है और भविष्य में भी हो नहीं सकती | इलाहाबाद के कपारी गाँव की
इस अनोखी रवायत की वजह है यहाँ इन लोगो के बीच सदियों से चली आई एक
परम्परा जिसे स्थानीय भाषा में " बदला " कहा जाता है | बदला यानी जिस किसी
को अपनी बहन की शादी करनी हो उसे अपने भाई की शादी भी अपने होने वाले जीजा
से करनी होगी | सरल शब्दों में कह लीजिये की बहन के बदले बदले बहन | और जब
शादी में दुल्हा दुल्हन की अदला बदली हो गई तब शादी में दहेज़ का लेनदेन का
सवाल ही नहीं उठता |
गाँव
की इस ख़ास खूबी के चलते इस गाँव में जीजा और साले ही रहते है इस गाँव की
इसी खूबी की वजह से इसे जीजा साले का गाँव भी कहा जाता है | एक हजार की
आबादी वाले इस गाँव में ज्यादतर सपेरा जाति से ताल्लुक रखने वाले लोग रहते
.
जो बेहद गरीब होते है ऐसे में शादी के दहेज़ के लिए उनके पास इतना पैसा भी
नहीं रहता जिससे दहेज़ नाम की यह बुराई यहाँ पनप पाती | आर्थिक और सामाजिक
तानेबाने ने यहाँ बदला परम्परा को जन्म दिया होगा जो आज भी इस गाँव में
कायम है | तरक्की का दौर आया यहाँ के बच्चे पढने लिखने में भी आगे निकलने
लगे लेकिन यह तरक्की भी इन्हें इनकी बदला परम्परा को अलग नहीं कर पाई है |
सुनैना सिंह


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