एक गाँव का कायाकल्प
संगम
नगरी इलाहाबाद का एक गाँव कच्ची शराब बनाने के लिए बदनाम था , आये दिन
यहाँ जहरीली शराब बनाने और उसे पीकर मरने वालो की खबरे आती रहती थी लेकिन
वहां के कुछ किसानो ने उस गाँव का कायाकल्प कर दिया है | जमुना किनारे
कछार में बसे जिस गाँव में दाखिल होते ही कच्ची शराब की बदबू से दम घुटने
लगता था आज उस गाँव की तरफ रुख करते ही गुलाब के फूलो की खुशबु के झोके से लोगो का मन बदल जाता है | कच्ची शराब की पहचान वाले इस गाँव को वहां के कुछ किसानो ने पूर्वांचल की सबसे बड़ी फूलो की मंडी में बदल दिया है जिसके फूलो की मांग इस माघ मेले अचानक बढ़ गई है |
इलाहाबाद के जमुना पार इलाके में जमुना नदी के ठीक किनारे बसा यह पुराना
गाँव है - अरैल | इस गाँव में शाम ढलने के पहले ही लोग दाखिल होने से डरते
थे वजह पूरे गाँव में जगह जगह कच्ची शराब की भट्टियां दहकती थी | इस कच्ची
शराब ने इस गाँव को उस मकाम में पहुचा दिया था की लोग इस गाँव की तरफ रुख
करने से घबराते थे | लेकिन अब इस गाँव का कायाकल्प हो गया है | इस गाँव को
नई पहचान दी है यहा के उन किसानो ने जो अब इस इलाके में फूलो की खेती कर रहे है | इनकी इसी कोशिश का नतीजा है इलाके में इसे फूलो की घाटी का दर्जा हासिल हो गया है | दिलीप और सुनंदा भी ऐसे ही कुछ किसानो में जिनका पूरा दिन फूलो के इन खेतो में गुजरता है |
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इस गाँव में तकरीबन हर घर में अब फूलो की
फसल लहलहा रही है | किसी खेत में आपको गुलाब की महक मिलेगी तो कही गेंदे
की खुशबु | चमेली और रातरानी से लेकर गुडहल सभी कुछ इनकी इस फूलो की घाटी में मौजूद है | गाँव मी सबसे अधिक पैदावार गुलाब के फूलो की
होती है | ये किसान बिना किसी सरकारी मदद के गुलाब की खेती यहा कर रहे है |
सबसे पहले ये अपने ही खेतो के स्वस्थ पौधों से गुलाब की कलम बनाते है फिर
घर की महिलाए इसे खेतो में रोपती है और फिर पौधे में फूल आने के बाद
स्थानीय किसान इसे पास की ही फूल मंडी में ले जाकर इससे लाखो की कमाई करते
है |
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यहाँ के फूल इलाहाबाद के अलावा बनारस , गाजीपुर और जौनपुर तक के पूर्वाचल के इलाको में भेजे जाते है |
संगम तट में इन दिनों दो महीने तक लगने वाला सबसे बड़ा सालाना धार्मिक मेला
माघ मेला लगा हुआ | इस मेले में हजारो साधू संत यहा एक महीने के लिए अपना
बसेरा बनाते है यही वजह है की इस गाँव के फूलो की सबसे अधिक मांग इन दिनों यहाँ देखने को मिलती है |

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