घूँघट से बदलाव की बयार
इलाहाबाद : देश भर में कही महिलाओ के उत्थान और जागरूकता के लिए कही एयर कंडीशन कॉन्फ्रेंस हॉल में महिलाओ के लिए तरक्की के कशीदे पढ़े जाते है तो कही महिला जागरूकता रैली निकालकर बताया जाता है महिलाए अब पीछे नहीं है । शहरी कागजी कवायद और रैलियों के इस शोर गुल से दूर इलाहबाद के कुछ छोटे से गाँवों में गाँव की ही कुछ पढ़ी लिखी और तकनीकी जानकारी रखने वाली कामगार महिलाये ने घूँघट में रहने वाली उन ग्रामीण महिलाओ को आर्थिक रूप से स्वालम्बी बनाने के गुर सिखाने में लगी है | गाँव की इन महिलाओं की पहल से अपने घर का चूल्हा चौका करने तक ही सीमित रहने वाली ये अनपढ़ महिलाए अब अपने और अपने बच्चो के लिए हर महीने हजारो रुपये कमा रही है जिनसे जहां एक तरफ जिन्दगी की दबी कुचली ख्वाहिशे पूरी हो रही है वहीं मर्दों की मदद लिए बगैर ये ग्रामीण महिलाए अपने बच्चो को भी अच्छी तालीम दे रही है |
इलाहबाद के इन छोटे से गाँवों में गाँव
की ही कुछ महिलाओं ने अपने गाँव की ही उन कम पढी और घरो की चहारदीवारी के
अन्दर रहने वाली महिलाओं को आर्थिक मुश्किलों से निपटने का फलसफा सिखाने में लगी है | गाँव के ही पंचायत भवन के वीरान पड़ी इमारत को इन्होने एक गुलजार रहने वाले गृह उद्योग में तब्दील कर दिया है | घर में घूँघट के अन्दर रहने वाली ये महिलाए यहाँ लाख से तैयार होने वाले ऐसे हस्तशिल्प के उत्पाद बनाने में लगी है जिनकी इन दिनों शहरी जीवन में अच्छी खासी मांग है |
इलाहाबाद
के रतौली और हसनपुर गाँव की महिलाओं के कायाकल्प की कहानी की शुरुआत हुई
उस समय हुई जब गाँव की ही कुछ पढी लिखी महिलाओं की नजर गाँव के आसपास
पैदा होने लाख की उस फसल पर पडी जिसे किसान तैयार होने के बाद लाख के बड़े
बड़े उत्पादको को बेच देते थे | गाँव की ऐसी ही एक महिला सीमा बताती है की
इन महिलाओं ने लाख का कारोबार करने वाले इन कारोबारियों से समपर्क किया और
उनसे लाख से बने उत्पादों को खुद बनाने का प्रस्ताव रखा | लेकिन इनके
सामने रास्ता रोक कर खडी हो गई इन उत्पादों में आधुनिक
डिजाइनों और हस्तलिप के उत्पादों का निर्यात करने वाली बड़ी बड़ी फर्मो की
मांग के मुताबिक़ उत्पादों का निर्माण करने की तकनीकी की कमी | इस कमी को
स्थानीय गैर सरकारी संगठन बायो वेद शोध संस्थान ने प्रधानमन्त्री कौशल
विकास योजना में डिजाइन बनाने के काम में लगी महिलाओं की मदद ने पूरा कर दिया |
संस्थान के मुखियां ब्रिजेन्द्र कुमार दिवेदी ने इन महिलाओं की काबिलियत
को परखा और उन्हें खाली समय के लिए एक ऐसा कमाई का जरिया दे दिया जिससे आज
ये सम्पन्न होती जा रही है | प्रधानमन्त्री कौशल विकास योजना में डिजाइन और ट्रेनर वंदना राठौर और संजय निषाद के मुताबिक़ लाख से
फैशनेबल चूड़ियाँ , मूर्तियां , सजावट के सामान के अलावा , घरो के नेम
प्लेट , होटलों के कमरों के नाईट लैम्प्स से लेकर लाख की फैशनेबल ज्वेलरी
बनाकर इन ग्रामीण महिलाओ ने परम्परागत लाख उद्योग की उपयोगिता के मायने ही
बदल दिए |
.इस गाँव की कुछ पढी लिखी महिलाओं ने गाँव में घूँघट के अन्दर रहने वाली महिलाओं को आर्थिक स्वालंबन के उस मुकाम में लाकर
खड़ा कर दिया है जहाँ इस गाँव की ये घरेलु गृहणिया रोज इस काम से महज चार
से पांच घंटे काम करके हर दिन दो सौ रुपये कमाती है | इनमे से ज्यादतर
महिलाए शिक्षा की कमी की वजह भले ही अपना नाम तक लिख पाती हो लेकिन अपने
हुनर के बल पर ये अब इतना कमा लेती है जिससे अपने घर के मर्दों के सामने
इन्हें अपने खर्चे और अपने बच्चो की पढ़ाई के लिए हाथ नहीं फ़ैलाने पड़ते |
गाँव की इन घुंघट में रहने वाली ग्रामीण महिलाओं की लगन और
हुनर की कहानी भले ही किसी अख़बार या न्यूज चैनेल की सुर्खियाँ न बने लेकिन
ये महिलाए उन तमाम महिलाओं के लिए एक रोशनी की किरन लेकर आई है जो शिक्षा
की कमी और घरेलू काम काज में ही ब्यस्त रहने के चलते अपने पैरो में खुद खड़े होने की बात तक नहीं सोंच पाती |
रिपोर्ट- पूर्णेन्दु पांडेय

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